देविंदरायगहवइदेवदसाहम्मि उग्गहं तम्हा ।
उग्गहविहिणा दिण्णं गेण्हसु सामण्णसाहणयं॥882॥
इन्द्र नरेन्द्र गृहस्थ और सुर, साधर्मी विधि पूर्वक दें ।
वही वस्तु हे क्षपक! ग्रहण कर ज्ञान तथा संयम साधे॥882॥
अन्वयार्थ : इसलिए देवेन्द्र, राजा, गृहपति, साधर्मी, देवताओं का परिग्रह अवग्रह अर्थात् देने योग्य विधिपूर्वक दिया गया भी मुनिपने के योग्य, ज्ञान और संयम का साधन हो, वह ग्रहण करना ।

  सदासुखदासजी