
रक्खाहि बंभचेरं अब्बंभं दसविधं तु वज्जित्ता ।
णिच्चं पि अप्पमत्तो पंचविधे इत्थिवेरग्गे॥883॥
दस प्रकार अब्रह्म त्यागकर ब्रह्मचर्य की रक्षा कर ।
पंच भेद नारी-विराज में सावधान रह अहो क्षपक!॥883॥
अन्वयार्थ : भो मुने! दस प्रकार के अब्रह्म का त्याग करके ब्रह्मचर्य की रक्षा करना । और पाँच प्रकार से स्त्रियों के प्रति वैराग्य प्राप्त करने में कभी भी प्रमादी नहीं होना ।
सदासुखदासजी