+ अब वह ब्रह्मचर्य पालने योग्य क्या है? वही कहते हैं - -
जीवो बम्भा जीवम्मि चेव चरिया हविज्ज जा जदिणो ।
तं जाण बंभचेरं विमुक्कपरदेहतित्तिस्स॥884॥
जीव ब्रह्म है अतः जीव में यति मुनियों की जो चर्या ।
पर-तन में व्यापार रहित है ब्रह्मचर्य है यही कहा॥884॥
अन्वयार्थ : ज्ञान-दर्शनादि द्वारा जो वृद्धि को प्राप्त हो, वह ब्रह्म है । यहाँ जीव को ब्रह्म कहते हैं । वह पर/देह, उसकी प्रवृत्ति से रहित यति की जो जीव/स्वस्वरूप में चर्या-प्रवृत्ति, वह ब्रह्मचर्य है ।

  सदासुखदासजी