पं-सदासुखदासजी
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दस प्रकार के अब्रह्म के त्याग से दस प्रकार का ब्रह्मचर्य होता है । इसलिए अब ब्रह्मचर्य के दस भेदों को कहते हैं -
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इत्थिविसयाभिलासो वत्थिविमोक्खो य पणिदरससेवा ।
संसत्तदव्वसेवा तदिंदियालोयणं चेव॥885॥
नारी की अभिलाषा वीर्यपतन अरु मादक रस सेवन ।
तत्सम्बन्धी1 वस्तु ग्रहण उसके अंगों का अवलोकन॥885॥
सदासुखदासजी