पं-सदासुखदासजी
सक्कारो संकारो अदीदसुमरणमणागदभिलासे ।
इठ्ठविसयसेवा वि य अब्बंभं दसविहं एदं॥886॥
सन्मान और शृंगार भूत2 का सुमरन, भावी अभिलाषा ।
इष्ट विषय का सेवन यह है दस अब्रह्म का भेद कहा॥886॥
सदासुखदासजी