एवं विसग्गिभूदं अब्बंभं दसविहंपि णादव्वं ।
आवादे मधुरम्मिव होदि विवागे य कडुयदरं॥887॥
ये अब्रह्म के भेद कहे हैं विष-सम एवं अग्नि समान ।
भोग समय ये मधुर लगें अत्यन्त कटुक इनका परिणाम॥887॥
अन्वयार्थ :
  1. स्त्री सम्बन्धी जो इन्द्रियविषयों की अभिलाषा वह स्त्रीविषयाभिलाषा है । स्त्रियों के सुंदर नेत्र, मुख, ग्रीवा, बाहु, कुच, उदर, नितम्ब तथा आभरण, वस्त्र, हाव-भाव, विलास, विभ्रम इत्यादि देखने की अभिलाषा तथा उनके सुन्दर मिष्ट वचन, शृंगार रस के भरे सुन्दर गीत सुनने की अभिलाषा, स्त्री के कोमल अंगों को स्पर्शन करने की अभिलाषा, अधर रस का पान करने की अभिलाषा, स्त्रियों के मुखादि से उत्पन्न गंध, इतर, फुलेल इत्यादि से उत्पन्न गंध को सूँघने की अभिलाषा, इत्यादि स्त्री संबंधी पंच इन्द्रियों के विषयों की अभिलाषा, वह [स्त्रीविषयाभिलाषा]] नामक प्रथम अब्रह्म है । जबकि स्त्री को देखना, भोगना इत्यादि विषय तो भोगांतराय नामक कर्म के क्षयोपशम के आधीन है, अपने आधीन नहीं; परंतु स्त्रियों को देखने, स्पर्श करने की अभिलाषा ही ब्रह्मचर्य नामक व्रत का नाश करके अब्रह्म नामक दोष पैदा करके दुर्गति का कारण ऐसे कर्म का बंध करती है।
  2. और काम से विकारी पुरुष के जो वीर्य का मोचन होता है, वह [[वस्तिविमोक्ष]] नामक अब्रह्म है।
  3. कामविकार के उत्पन्न करनेवाले जो पुष्टरस तथा मद करने वाली वस्तु, जिसके भक्षण करने से कामोद्दीपन हो जाये तथा अतिलंपटता बढ जाये, वह [[प्रणीतरससेवन]] नामक अब्रह्म है; अत: स्त्रीसंग बिना ही इन पुष्टरसों का भोजन ब्रह्मचर्य का घात तो करता ही है । इसे वृष्याहार सेवन भी कहते हैं।
  4. स्त्रियों से तथा कामी पुरुषों से संसक्त/संबंध को प्राप्त हुई शय्या, आसन, महल, मकान, बाग तथा कामियों के पहनने योग्य विकाररूप वस्त्राभरण उसका सेवन करना; वह [[संसक्त द्रव्यसेवन]] नामक अब्रह्म है ।
  5. साक्षात् स्त्रियों को रागभाव से, प्रीतिपरिणाम से अवलोकन करना; वह [[इन्द्रियावलोकन]] नामक अब्रह्म है ।
  6. स्त्रियों का सत्कार, आदर, वचनालाप रागभाव से करना; वह [[सत्कार]] नामक अब्रह्म है।
  7. अपने शरीर का गंध-पुष्पादिकों से तथा स्नान, उद्वर्तनादि, उबटनादि से संस्कार करना; वह [[संस्कार]] नामक अब्रह्म है।
  8. पूर्व में जो भोग भोगे या श्रवण किये, देखे, उनको याद करना; वह [[अतीतस्मरण]] नामक अब्रह्म है ।
  9. आगामी काल में काम-भोग, क्रीडा, शृंगारादि की अभिलाषा, वह [[अनागताभिलाष]] नामक अब्रह्म है
  10. और मर्यादा रहित यथेच्छ विषयों का सेवन/निरर्गल जाना, आना, बोलना, बैठना, खाना, पीना, रात्रि में संचार करना, यथेच्छ/स्वच्छंदपने योग्य-अयोग्य का विचाररहित संगादि करना, अयोग्य द्रव्य का सेवन, अयोग्य क्षेत्र में जाना, आना, सोना, बैठना इत्यादि मर्यादारहित प्रवर्तना, वह [[इष्ट विषय सेवन]] नामक अब्रह्म है
इसप्रकार ये दस तरह के अब्रह्म जीव को अचेत करके धर्मरहित करके ऐसे घातते हैं कि अनंतानंत काल में भी सचेत नहीं हो सके । इससे ही अब्रह्म को विषरूप कहा है और आत्मा को संताप का कारण है तथा दर्शन, ज्ञान, चारित्र को दग्ध कर मूल से ही नाश करने वाला है । इसलिए अब्रह्म अग्नि-समान है । ऐसे अब्रह्म को विषरूप तथा अग्निरूप जानना योग्य है । कैसा है वह दस प्रकार का अब्रह्म? भोगते समय तो अज्ञानी जीवों को मिष्ट दिखता है और उदयपरिपाक काल में अति-कटुक है ।

  सदासुखदासजी