
जावइया किर दोसा इहपरलोए दुहावहा होंति ।
सव्वे वि आवहदि ते मेहुणसण्णा मणुस्सस्स॥889॥
इस भव अरु पर-भव में जितने दुःखदायक हैं दोष कहे ।
इस मनुष्य की मैथुन संज्ञा में वे ही सब दोष रहें॥889॥
अन्वयार्थ : इस लोक में तथा परलोक में दु:ख के करने वाले जितने दोष हैं, उन सर्व दोषों को मनुष्य की एक मैथुन की अभिलाषा ही प्राप्त कराती है ।
सदासुखदासजी