सोयदि विलपदि परितप्पदी य कामादुरो विसीयदि य ।
रत्तिदिवा य णिद्दं ण लहदि पज्झादि बिमणो य॥890॥
कामातुर नर शोच और परिताप विषाद विलाप करे ।
नींद न आये निश-दिन और उदास मनस्क रहे झूरे॥890॥
अन्वयार्थ : काम से पीडित मनुष्य सोच/चिंता करता है, विलाप करता है, परिताप को प्राप्त होता है, विषाद करता है । रात्रि में, दिन में निद्रा नहीं लेता है और विमनस्क हुआ उनमना/उल्टासीधा चिंतवन करता है ।

  सदासुखदासजी