
सयणे जणे य सयणासणे य गामे घरे व रण्णे वा ।
कामपिसायग्गहिदो ण रमदि य तह भोयणादीसु॥891॥
स्वजनों अन्य जनों में शयनासन-भोजन में घर वन में ।
इत्यादिक में काम पिशाच ग्रस्त मानव-मन नहीं रमे॥891॥
अन्वयार्थ : कामी पिशाच द्वारा गृहीत पुरुष, वह स्वजन जो अपनी स्त्री, पुत्र, कुटुम्बादि में नहीं रमता है तथा अन्य जनों में, शयन में, ग्राम में, गृह में, वन में, भोजन-पान, वस्त्र, आभरण, राग-रंग, महल, मकान, द्रव्य के उपार्जन में, राजसेवा, धन-संपदा लेने-देने में, धरने-उठाने में, किसी रचना में नहीं रमता है । अत: जिस स्त्री या पुरुष, नपुंसकादि के दर्शन, स्पर्शन, क्रीडनरूप, राग बन्ध्या/लगा हो; उसे मिलने पर ही चैन पाता है । काम-पिशाच के समान यह जाति है । किसी नीच दासी, वेश्या या चांडाली, भीलणी इत्यादि किसी नीच स्त्री से स्नेह हो रहा हो तथा किसी नीच, अधम, विजातीय दास कर्म करने वाला, अभक्ष्य भक्षी दासी पुत्र या घोडे का चाकर, चारण-भाट, ढोल बजाने वाले इत्यादि से स्नेह हो गया हो तो उसका संयोग मिल जाने पर ही चैन पडती है । अनेक रूपवती, कुलवती, वस्त्राभरणसहित स्वयं की विवाहित स्त्रियों का संयोग तथा सुबुद्धिपुत्रों का संयोग विष समान भासेगा । इसलिए काम समान दूसरा पिशाच नहीं है ।
सदासुखदासजी