
कामादुरस्स गच्छदि खणो वि संवच्छरो व पुरिसस्स ।
सीदंति य अंगाइं होदि अ उक्कंठिओ पुरिसाो॥892॥
कामातुर मनुष्य का इक पल हो व्यतीत इक वर्ष समान ।
अंग अंग में रहे वेदना सदा रहे उत्कण्ठित मन॥892॥
अन्वयार्थ : अपने स्नेही के संबंधरहित कामातुर पुरुष को क्षणमात्र भी संवत्सर/युग बराबर हो जाता है और सभी अंगों में वेदना होने लगती है । मन ऐसा उत्कंठित/लालायित हो जाता है कि उसको दूसरा कोई दिखता ही नहीं । बारम्बार परिणाम - चित्त उसके प्रति ही लगा रहता है, अन्य भोजन-पान-शयन-स्त्री-पुत्रादि में रचता ही नहीं, उसे उत्कंठा कहते हैं । यह सब कामातुर को होता है ।
सदासुखदासजी