
पाणिदलधरिदगंडो बहुसो चिंतेदि किंपि दीणमुहो ।
सीदे वि णिवाइज्जइ बेवदि य अकारणे अंगं॥893॥
गाल हथेली पर रखकर वह चिन्ता करे रहे मुख दीन ।
शीतकाल में आए पसीना अंग कँपे बिन कारण ही॥893॥
अन्वयार्थ : कामातुर पुरुष अपने हस्ततल/हथेली पर रखा है गंडस्थल/माथा जिसने और दीन है मुख जिसका, ऐसा अनेक बार यों ही चिंतवन/विचार करता है और ठंडी के समय में भी पसीने से व्याप्त हो जाता है । कामी का अंग - शरीर वह बिना कारण ही काँपने लगता है ।
सदासुखदासजी