
कामुम्मत्तो संतो अंतो डज्झदि य कामचिंताए ।
पीदो व कलकलो सो रदग्गिजाले जलंतम्मि॥894॥
कामोन्मत्त पुरुष, अन्तर में जले काम की चिन्ता से ।
पीत ताम्र द्रववत्1 जलता है अरति अग्नि की ज्वाला में॥894॥
अन्वयार्थ : काम से उन्मत्त होता हुआ पुरुष काम की चिंता करके अन्तरंग में दग्ध होता है । जैसे कोई गाल्या/अग्नि से पिघलाया हुआ ताँबा, उसे पी ले तो अंतरंग हृदय में दग्ध होता है, मूर्च्छित हो जाता है, तैसे ही कामी अपनी वांछित स्त्री का संगम या पुरुष का संगम न पाने से जलता है - अंतरंग में आर्तिरूप अग्नि की ज्वाला में जलता है ।
सदासुखदासजी