
कामदुरो णरो पुरा कामिज्जंते जण्णे हु अलहंतो ।
धत्तदि मरिदुं बहुधा मरुप्पवादादिकरणेहिं॥895॥
कामोन्मत्त पुरुष को यदि मनचाही स्त्री नहीं मिले ।
मेरु-प्रपातादिक2 विधि से वह मरण प्राप्ति का यत्न करे॥895॥
अन्वयार्थ : कामातुर जीव अपने वांछित - जिससे प्रीति के बन्धन को प्राप्त हुआ है - ऐसी कोई स्त्री या पुरुष अपने से पराङ्मुख हो जाये या हजारों प्रकार से दीनता करने पर भी आपसे प्रीति छोड दे अथवा कोई दूसरा धनवान, रूपवान, ऐश्वर्यवान उसमें आसक्त हो जाये और आपसे प्रीति संकोच/समेट ले और आपके निर्धनपने से, वृद्धपने के कारण आपको नहीं गिने तो अनेक प्रकार से - पर्वत से गिरना, समुद्र में पडना, अग्नि में प्रवेश करना, दीवाल से, स्तम्भ/ खम्भे से मस्तक फोडकर मर जाना, वन में प्रवेश कर जाना, गले में फाँसी लगाकर मर जाना, शस्त्राघात से मरना तथा विषभक्षणादि से मर जाना - इत्यादि प्रकार से मरण में प्रवर्तता है ।
सदासुखदासजी