पं-सदासुखदासजी
संकप्पंडयजादेण रागदोसचलजमल जीहेण ।
विसयबिलवासिणा रदिमुहेण चिंतादिरोसेण॥896॥
संकल्परूप अण्डे से होता राग-द्वेष दो जीभ सहित ।
विषयरूप बिल में निवास है रतिमुख अरु चिन्ता अति रोष॥896॥
सदासुखदासजी