
कामभुजगेण दट्टा लज्जाणिम्मोगदप्पदाढेण ।
णासंति णरा अवसा अणेयदुक्खावहविसेण॥897॥
लज्जारूप काँचली तजता मद है दाढ़ दुःख है विष ।
जिसे उसे वह नर विनष्ट हो एेसा कामरूप यह सर्प॥897॥
अन्वयार्थ : कामरूपी सर्प से डसा हुआ जीव अपने ज्ञान-दर्शनादि का नाश कर पराधीन हुआ नाश को प्राप्त होता है । नरक-निगोद को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी