पं-सदासुखदासजी
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वे दश वेग कैसे हैं, यह कहते हैं-
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पढमे सोयदि वेगे दट्ठुं तं इच्छदे विदियवेगे ।
णिस्सदि तदियवेगे आरोहदि जरो चउत्थम्मि॥899॥
प्रथम वेग में सोचा करता दूजे में मिलना चाहे ।
तीजे में नि:श्वास दीर्घ हो चौथे में ज्वर हो जाये॥899॥
सदासुखदासजी