डज्झदि पंचमवेगे अंगं छट्ठे ण रोचदे भत्तं ।
मुच्छिज्जदि सत्तमए उम्मत्तो होइ अट्ठमए॥900॥
अंग जलें पंचम प्रवेग में भोजन रुचे न छठवें में ।
मूर्च्छित हो जाना सप्तम में हो उन्मत्त आठवें में॥900॥

  सदासुखदासजी