णवमे ण किंचि जाणादि दसमे पाणेहिं मुच्चदि मदंधो ।
संकप्पवसेण पुणो वेगा तिव्वा व मंदा वा॥901॥
नवमें में निज को नहिं जाने मरण प्राप्त हो दसवें में ।
कामातुर के तीव्र मन्द संकल्प रूप दस वेग कहे॥901॥
अन्वयार्थ : काम के प्रथम वेग में सोच (विचार) करता है । जिसे देखा था, सुना था, उसका बारम्बार चिंतवन करता है । दूसरे वेग में देखने की अति इच्छा उत्पन्न होती है, उसे देखे बिना परिणाम अति आकुल-व्याकुल होते हैं । तीसरा वेग चढता है, तब अतिदीर्घ श्वास लेने लगता है । चौथे वेग में शरीर में ज्वर/बुखार उत्पन्न हो जाता है । पाँचवें वेग में अंग जलने लगते हैं । छठवें वेग में भोजन नहीं रुचता । सातवें वेग में मूर्च्छित हो जाता है । आठवें वेग में उन्मत्त/ पागल-सा हो जाता है । नववें वेग में ज्ञान रहित हो जाता है । दशवें वेग में मद से अन्धा हुआ प्राणरहित हो जाता है । संकल्प के वश से ये दस वेग किसी के तीव्र होते हैं तो किसी के मन्द होते हैं । जैसी राग की तीव्रता-मन्दता हो, उस प्रमाण में वेग चढते हैं ।

  सदासुखदासजी