विज्झायदि सूरग्गी जलादिएहिं ण तहा हु कामग्गी ।
सूरग्गी डहदि तयं अब्भंतरबाहिरं इदरो॥904॥
सूर्य ताप हो शान्त नीर से किन्तु न हो कामाग्नि शान्त ।
सूर्य उष्णता त्वचा जलाती अन्तर्बाह्य जलाता काम॥904॥
अन्वयार्थ : सूर्य की अग्नि तो शरीर ही को दग्ध करती है, किन्तु कामरूपी अग्नि तो आत्मा के अभ्यंतर ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, शील, संयमादि को दग्ध करती है और बाह्य में शरीर को, इन्द्रियों को, यश को, व्यवहार को, पूज्यपने को, कुलवंतपने को तथा धनवंतपने को नष्ट करती है ।

  सदासुखदासजी