+ अर्थ - सूर्य की अग्नि तो दिवस में ही दग्ध करती है - आताप करती है; लेकिन काम- -
जादिकुलं संवासं धम्मं णिय बंधवम्मि अगणिंतो ।
कुणदि अकज्जं पुरिसो मेहुणसण्णाए संमूढो॥905॥
जाति और कुल या सहवासी, बन्धु मित्र की नहिं परवाह ।
मूढ़ हुआ मैथुन संज्ञा से जो नर करता सभी अकार्य॥905॥
अन्वयार्थ : मैथुन की इच्छा से ग्रसित पुरुष अपनी जाति को नहीं गिनता, कुल को नहीं गिनता, जिनकी संगति/साथ रहा, उन्हें नहीं गिनता तथा धर्म को, कुटुम्ब को नहीं गिनता, नहीं करने योग्य अकार्य को भी करता है ।

  सदासुखदासजी