
कामपिसायग्गहिदो हिदमहिदं होइ वा ण अप्पणो मुणदि ।
होइ पिसायग्गहिदो वसदा पुरिसो अणप्पवसो॥906॥
काम पिशाच ग्रस्त नर अपना हित या अहित नहीं जाने ।
ग्रस्त पिशाच मनुजवत् वह भी अपने वश में नहीं रहे॥906॥
अन्वयार्थ : कामरूपी पिशाच द्वारा गृहीत हुआ पुरुष अपने हित और अहित को नहीं जानता । पिशाच गृहीत पुरुष की तरह सर्वकाल में कभी भी अपने वश में नहीं रहता ।
सदासुखदासजी