
णीचो व णरो बहुगं पि कदं कुलपुत्तओ वि ण गणेदि ।
कामुम्मत्तो लज्जालुओ वि तह होदि णिल्लज्जो॥907॥
यथा नीच नर विस्मृत करता निज पर किया हुआ उपकार ।
त्यों कुलीन अरु लज्जावान मनुष्य काम से हो निर्लज्ज॥907॥
अन्वयार्थ : काम से उन्मत्त ऐसा कुलवान पुरुष भी पर के द्वारा किये गये अनेक उपकारों को नीच पुरुष की तरह नहीं गिनता है ।
सदासुखदासजी