कामी सुसंजदाण वि रूसदि चोरो व जग्गमाणाणं ।
पिच्छदि कामग्धत्थो हिदं भणंते व सत्तू व॥908॥
चोर जागने वालों पर कामी संयमियों पर हों कष्ट ।
हित उपदेशक जन को कामी लखते शत्रु समान अनिष्ट॥908॥
अन्वयार्थ : जैसे जागृत पुरुष के ऊपर चोर रोष करता है, तैसे ही कामी पुरुष सुन्दर संयमियों पर रोष करता है । कामी को शीलवान, त्यागी पुरुष महाबैरी दिखते हैं । अत: काम से व्याप्त पुरुष अपने हित की कहने वालों को शत्रु की तरह देखता है ।

  सदासुखदासजी