
कामग्धत्थो पुरिसो तिलोयसारं जहदि सुदलाभं ।
तेलोक्कपूइदं पि य माहप्पं जहदि विसयंधो॥910॥
कामासक्त त्रिलोकसार-श्रुतज्ञान लाभ को देता छोड़ ।
हो विषयान्ध त्रिलोक-पूज्य निज महिमा को भी देता छोड़॥910॥
अन्वयार्थ : काम के द्वारा ग्रस्त पुरुष त्रैलोक्य में सार ऐसे श्रुतज्ञान के लाभ को त्याग देता है ।
सदासुखदासजी