
तह विसयामिसघत्थो तणं व तवचरणदंसणं जहइ ।
विसयामिसगिद्धस्स हु णत्थि अकायव्वयं किंचि॥911॥
होता विषय-मांस आसक्त करे दर्शन-तप-चारित त्याग ।
विषयामिष आसक्त मनुज को कुछ भी होता नहीं अकार्य॥911॥
अन्वयार्थ : वैसे ही विषयरूप मांस से ग्रस्त लंपटी पुरुष तपश्चरण को तथा सम्यग्दर्शन को त्याग देता है । विषयरूप मांस में लंपटी पुरुष किंचित् मात्र भी नहीं करने योग्य - ऐसे सम्पूर्ण अकृत्य करता है ।
सदासुखदासजी