
अरहंतसिद्ध आयरिय उवज्झाय सव्वसाहु वग्गाणं ।
कुणदि अवण्णं णिच्चं कामुम्मत्तो विगयवेसो॥912॥
अर्हत सिद्धाचार्य उपाध्याय और सर्व साधु गण का ।
कामोन्मक्त वेश-विकृत धर करे अवर्णवाद सबका॥912॥
अन्वयार्थ : काम से उन्मत्त पुरुष का वेष विकार रूप होता है और वह अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधुओं के समूह का सदा काल अवर्णवाद करता है । पंच परमेष्ठी के झूठे दोष प्रकाशित करता है - निंदा करता है । कामी पुरुष के बराबर कोई पातकी नहीं है ।
सदासुखदासजी