अजसमणत्थं दुक्खं इहलोए दुग्गदी य परलोए ।
संसारं पि अणंतं ण मुणदि विसयामिसे गिद्धो॥913॥
इस भव के दुख परभव-दुर्गति अरु अपयश अनर्थकारी ।
अरु संसार अनन्त न जाने जो नर विषयामिष लोभी॥913॥
अन्वयार्थ : विषयरूप मांस में जिसकी तीव्र लंपटता है, वह पुरुष इस लोक में अपना अपयश होता है - यह नहीं जानता है/नहीं मानता है । अनर्थ होने को भी नहीं जानता । राजा का दंडजनित, अपवादजनित, धननाश होने से तथा प्राणों के घात इत्यादि से उत्पन्न दु:ख को नहीं जानता, परलोक में नरकादि दुर्गति में जाना पडेगा, यह नहीं जानता तथा अनंतानंतकाल पर्यंत संसार में परिभ्रमण होगा, उसे भी नहीं जानता है/नहीं गिनता है ।

  सदासुखदासजी