
णीचं पि विसयहेदुं सेवदि उच्चो वि विसयलुद्धमदी ।
बहुगं पि य अवमाणं विसयंधो सहइ माणी वि॥914॥
उच्चकुलीन विषयलोभी भी करे नीच-सेवन विषयार्थ ।
धनिकों द्वारा किया गया अपमान सहे भी वह विषयान्ध॥914॥
अन्वयार्थ : विषयों में अन्धा अपना बहुत अपमान सहता है तथा ताडना, दुर्वचनादि के लाभ को महान लाभ मानता है । कामान्ध बराबर जगत में कोई अन्ध है ही नहीं ।
सदासुखदासजी