णीचं पि कुणदि कम्मं कुलपुत्त दुगुंछियं विगदमाणो ।
वारित्तओ वि कम्मं अकासि जह लांधियाहिदुं॥915॥
मानहीन होकर वह करता महत् पुरुष के लिए अकार्य ।
यथा वारत्रक यति ने किया नर्तकी हेतु निन्दित कार्य॥915॥
अन्वयार्थ : विषयवांछा से अन्ध पुरुष मान रहित हुआ कुलवन्तों से निंदनीक, उच्छिष्ट भोजनादि वह भी अपने प्रीति के पात्र स्त्री-पुरुष, उनका भक्षण किया गया भी भक्षण करके (झूठा भोजन खाकर) अपने को धन्य भाग्य मानता है । जैसे अकुलीन स्त्री के लिये किसी वारत्रक नामक यति ने नीच कर्म किया ।

  सदासुखदासजी