सूरो तिक्खो मुक्खो वि होइ वसिओ जणस्स सधणस्स ।
विसयामिसम्मि गिद्धो माणं रोसं च मोत्तूण॥916॥
शूर, तेज अरु प्रमुख तथापि धनीजनों के वश होता ।
विषयामिष लोभी मनुष्य अभिमान-रोष काे भी तजता॥916॥
अन्वयार्थ : शूरवीर तथा किसी का कहा जरा भी नहीं सहने वाला - ऐसा तीक्ष्ण/क्रोधी, मुख्य अर्थात् लोगों में प्रधान ऐसा पुरुष भी विषय रूप मांस का लंपटी होता हुआ मान और रोष दोनों को छोडकर धनवानों के वशीभूत हो जाता है ।

  सदासुखदासजी