माणी वि असरिसस्सवि चडुयम्मं कुणदि णिच्चमविलज्जो ।
मादापिदरे दासो वायाए परस्स कामंतो॥917॥
अभिमानी भी नीच पुरुष की चाटुकारिता नित्य करे ।
मात-पिता को उनका सेवक और स्वयं को दास कहे॥917॥
अन्वयार्थ : काम की तीव्रता का प्रभाव जानना । जो काम के वशीभूत हैं, उसके इस लोक में तो यश उपार्जन करना और स्वाधीन रहना दोनों नहीं हैं और परलोक के लिये हितरूप ऐसा धर्म सेवन, सामायिक, स्वाध्याय, शुभध्यान, शुभभावना, शुभसंगति, वीतरागतादि सभी कल्याणरूप कार्य से पराङ्मुखता होती है ।

  सदासुखदासजी