वयणपडिवत्ति कुसलत्तणं पि णासइ णरस्स कामिस्स ।
सत्थप्पहदा तिक्खा वि मदी मंदा तहा हवदि॥918॥
कामीजन की वचन कुशलता और बुद्धि हो जाती नष्ट ।
शास्त्रों में प्रविष्ट अति पैनी बुद्धि भी हो जाती नष्ट॥918॥
अन्वयार्थ : कामी पुरुष के वचन बोलने में प्रवीणपना नष्ट हो जाता है । ये वचन बोलने लायक हैं, ये वचन बोलने लायक नहीं हैं । हमारा पद ऐसा, इसका पद ऐसा, अनेक सुनने वाले लोग क्या कहेंगे? मैं इतना बडे पद का धारी, दूसरे नीच जन, भांड जन, उनके समान वचन कैसे कहता हूँ? ऐसा विचार ही नष्ट हो जाता है । अनेक शास्त्रों के ज्ञान से तथा लौकिक-व्यवहारज्ञान से सँभाली हुई बुद्धि भी मन्द हो जाती है ।

  सदासुखदासजी