
होदि सचक्खू वि अचक्खू व वधिरो वा वि होइ सुणमाणो ।
दुट्ठकरेणुपसत्तो वणहत्थी चेव संमूढो॥919॥
नेत्र युक्त होकर भी अन्धा कान सहित भी बहरा है ।
हुआ दुष्ट हथिनी में अति आसक्त हस्तिवत् कामी है॥919॥
अन्वयार्थ : कामोन्मत्त पुरुष नेत्रों सहित होने पर भी अन्धे के समान देखता है और कर्ण सहित है तो भी नहीं सुनता । कपट की हथिनी में आसक्त वन के हाथी के समान मूढ होता है ।
सदासुखदासजी