
सलिलणिवुटड्डोय णरो वुज्झंतो विगदचेयणो होदि ।
दक्खो वि होइ मंदो विसयपिसा ओवहदचित्तो॥920॥
जल में डूबा अरु प्रवाह में बहता नर चेतना विहीन ।
विषय-प्रेत से ग्रस्त मनुज हो मन्द भले वह रहे प्रवीण॥920॥
अन्वयार्थ : जैसे जल में डूबा हुआ और प्रवाह में बहने वाला पुरुष चेतनारहित हो जाता है, तैसे ही सर्व कार्य में प्रवीण पुरुष भी विषयरूप पिशाच से जिसका चित्त नष्ट हुआ है, वह सर्व कार्य में मन्द होता है, मूर्ख होता है ।
सदासुखदासजी