
सीदं उण्हं तण्हं छुहं च दुस्सेज्ज भत्त पंथसमं ।
सुकुमारो वि य कामी सहइ भारमवि गरुयं॥922॥
सर्दी-गर्मी भूख-प्यास खोटी शय्या रूखा भोजन ।
है सुकुमार तथापि बोझ ले चले करें श्रम कामुक जन॥922॥
अन्वयार्थ : कोमल अंग का धारक भी कामी पुरुष अपनी वांछित स्त्री या पुरुष, उसके संगम के लिये अपने घर का सुखकारी महल, वस्त्र, पलंग, सुन्दर स्त्री, पाँचों इन्द्रियों के भोगों को छोडकर, पर के द्वार पर भूमि में, धूल में, पत्थरों में पडा हुआ अपने उच्चपन को नहीं जानता । अत्यन्त विषय की आशा से शीत ॠतु की रात्रि में शीतवेदना सहता है तथा ग्रीष्म ॠतु का आताप सहता है, तृषा सहता है, भूख सहता है, खोटी शय्या, खराब भोजन अंगीकार करता है, मार्ग का खेद सहता है और अधिक से अधिक भार/बोझा ढोता है, सुकुमार अंग का धारक भी कामांध अपनी वेदना को नहीं गिनता है ।
सदासुखदासजी