सेवदि णिवादि रक्खदि गोमहिसिमजावियं हयं हत्थिं ।
ववहरदि कुणदि सिप्पं सिणेहपासेण दढबद्धो॥924॥
घास उखाड़े गाय भैंस बकरी घोड़ादिक पशु पाले ।
स्नेह पाश दृढ़ बँधा हुआ व्यापारादिक सब कार्य करे॥924॥
अन्वयार्थ : विषयों के वशीभूत हुआ उच्च कुल में जन्मा हुआ पुरुष भी क्या-क्या करता है? जिसमें प्रीति लगी ऐसे स्त्री-पुरुष के सामने बैठा हुआ भी नीच व्यक्ति की तरह गाता है, नाचता है । यदि कार्य हो तो उसके लिये दौडता है, खोदता है, बोता है, काटता है, मर्दन करता है, सींता है, बुनता है, याचना करता है तथा स्नेहपाश से बँधा हुआ और क्या करता है? सेवा करता है, साथ में ही देशांतर को निकल जाता है, अपने स्नेही की गाय, भैंस, बकरा, छेली/बकरी तथा अवि/भेड, घोडा, हाथी - इनकी रक्षा करता है, वणज करता है, शिल्पी का काम करता है तथा स्नेह का मारा उत्तम कुल संबंधी उत्तम आजीविका तथा धनसंपदा को त्याग कर अपने स्नेही के साथ नीच कर्म से आजीविका करके जीता है तथा भिक्षा/भीख माँगता फिरता है ।

  सदासुखदासजी