वेढेइ विसयहेदंु कलत्तपासेहिं दुव्विभोएहिं ।
कोसेण कोसियारुव्व दुम्मदी णिच्च अप्पाणं॥925॥
ज्यों रेशम का कीड़ा मुख के तारों से खुद को बाँधे ।
विषय हेतु दुर्मति नर खुद को पाश-कामिनी से बाँधे॥925॥
अन्वयार्थ : जैसे कोशकार नामक रेशम की लट, वह अपने मुख से ताँता/लार निकाल कर अपने को ही बाँधती है, तैसे ही दुर्बुद्धि जीव विषयों के लिये स्त्रीरूपी पाश से स्वयं को सदा ही वेष्टन/बाँधता है - बेढता है । कैसा है स्त्री रूपी पाश? जो दु:ख से भी नहीं छूटता ।

  सदासुखदासजी