पं-सदासुखदासजी
रागो दोसो मोहो कसायपेसुण्ण संकिलेसो य ।
ईसा हिंसा मोसा सूया तेणिक्क कलहो य॥926॥
राग-द्वेष संक्लेश मोह ईर्ष्या कषाय हिंसा पैशून्य1 ।
चोरी कलह वृथा बकवाद तिरस्कार ठगना असहिष्णु॥926॥
सदासुखदासजी