
जंपणपरिभवणियडिपरिवादरिपुरोगसोगधणणासो ।
विसयाउलम्मि सुलहा सव्वे दुक्खावहा दोसा॥927॥
शत्रु रोग धननाश शोक अरु हैं परोक्ष में दोष कहे ।
ये सब दुःखद दोष कामातुर जीवों में हैं सुलभ रहें॥927॥
अन्वयार्थ : विषयों की वांछा से आकुलित जो पुरुष, उसमें दु:ख देने वाले इतने सर्व दोष प्रगट होते हैं । वे दोष कौन-कौन हैं? यह कहते हैं - राग, द्वेष, कषाय, पैशून्य, मोह, संक्लेश तथा पर के गुणों को नहीं सह सकना - यह ईर्ष्या है । हिंसा, झूठ, असूया/गुणों में दोषों का आरोपण करना, चोरी, कलह, वृथा बकवाद, तिरस्कार, कपट तथा अपवाद इत्यादि हजारों दोष कामी पुरुष में प्रगट हो जाते हैं और अनेक लोग बिना कारण बैरी हो जाते हैं तथा रोग, शोक, धन का नाश - इतने सभी दोष काम के वशीभूत पुरुष के प्रगट होते हैं । इनका विस्तार लिखने से कथन बहुत हो जायेगा, प्रत्यक्ष अपने-अपने ज्ञान में प्रगट देखते ही हैं ।
सदासुखदासजी