अवि य वहो जीवाणं मेहुणसेवाए होइ बहुगाणं ।
तिलणालीए तत्ता सलायवेसो य जोणीए॥928॥
मैथुन सेवन में होता है बहुत जीव का घात अरे ।
तिल से भरी नली में लोह सलाई से तिल घात करे॥928॥
अन्वयार्थ : जैसे तिलों की नाली में संतप्त/गर्म लोहे की सलाई के प्रवेश करते ही तिलों का घात होता है, तैसे ही मैथुन सेवन से योनिस्थान में बहुत बादर निगोदिया जीवों का, त्रस जीवों का नाश होता है ।

  सदासुखदासजी