
कामुम्मत्तो महिलं गम्मागम्मं पुणो अविण्णाय ।
सुलहं दुलहं इच्छियमणिच्छियं चावि पत्थेदि॥929॥
भोग्य-अभोग्य सुलभ-दुर्लभ यह मुझे चाहती या कि नहीं ।
करे याचना कामातुर नर इत्यादिक जाने बिन ही॥929॥
अन्वयार्थ : काम से उन्मत्त पुरुष या स्त्री योग्य है या अयोग्य, सुलभ है या दुर्लभ, यह मुझे चाहती है या नहीं चाहती - इत्यादि के ज्ञान रहित होकर प्रार्थना करता है - प्रीति के लिये याचना करता है ।
सदासुखदासजी