दट्ठूण परकलत्तं किंहिदा पत्थेइ णिग्घिणो जीवो ।
ण य तत्थ किं पि सुक्खं पावदि पावं च अज्जेदि॥930॥
पर-नारी लख लज्जा त्याग, प्रार्थना क्यों करता कामान्ध ।
इससे किंचित् सुख नहिं पाता उल्टा करे पाप का बन्ध॥930॥

  सदासुखदासजी