आहट्टिदूण चिरमवि परस्स महिलं लभित्तु दुक्खेण ।
उप्पित्थमाविसत्थं अणिव्वुदं तारिसं चेव॥931॥
चिर वांछित यदि मिले कदाचित् बड़े कष्ट से पर-नारी ।
अविश्वस्त अतृप्त आकुलित किन्तु पूर्ववत् हो फिर भी॥931॥

  सदासुखदासजी