
कहमवि तमंधयारे संपत्तो जत्थ तत्थ वा देसे ।
किं पावदि रइसुक्खं भीदा े तुरिदो वि उल्लाखो॥932॥
किसी तरह से अन्धकार में जहाँ तहाँ वह प्राप्त करे ।
भयाकुलित हो शीघ्र करे संभाषण क्या रति सुख पाये॥932॥
अन्वयार्थ : प्रथम तो यह जीव कामांध हुआ पर की स्त्री को देखकर निर्लज्ज हुआ कैसी वांछा करता है? पर की स्त्री की वांछा में कुछ भी सुख प्राप्त नहीं होता, केवल पाप का ही संचय करता है ।
सदासुखदासजी