जदि दा जणेइ मेहुणसेवा पावं सगम्मि दारम्मि ।
अदितिव्वं कह पावं ण होज्ज परदारसेविस्स॥934॥
यदि अपनी पत्नी से मैथुन सेवन में भी होता पाप ।
तो परनारी सेवन में क्यों उससे तीव्र बँधे नहिं पाप॥934॥
अन्वयार्थ : जब अपनी स्त्री से मैथुन सेवन में पाप उत्पन्न होता है तो पर की स्त्री सेवन से अतितीव्र पाप कैसे नहीं होगा? यहाँ किसी को ऐसी आशंका होती है कि कामसेवन तो अपनी स्त्री या पर की स्त्री के सेवन में पाप तो दोनों में बराबर ही होगा, ऐसा नहीं जानना; क्योंकि अपनी स्त्री का सेवन तो ऐसा है कि पूर्व उपार्जित कर्म, उसके संगम से मिला उस स्त्री के कर्म उदय से तथा मन्द राग से भोगता है । अत: मन्द राग से उत्पन्न मन्द ही बंध होता है और पर की स्त्री में अतितीव्र राग के संकल्प से आसक्त होता है । अपनी स्त्री का संयोग करता है, तब तो अल्प राग होता है और पर की स्त्री के प्रति रात्रि-दिन किसी भी समय में आसक्तता नहीं छूटती तथा रात्रि-दिन दुर्ध्यान ही बना रहता है और तृप्ति भी नहीं होती । उसमें ऐसा तीव्र परिणाम उपजता है कि पर स्त्री के लिये स्वयं मर जाये और सामने वाले को भी मार डालता है या अन्य दुष्टों को धन देकर उसके पति-पुत्रादि को मरवा डालता है । जगत में अपने अपयश को नहीं गिनता । जाति-कुल से भ्रष्ट हो जाने को नहीं गिनता । बन्दीगृह में बन्द रहना, सर्व धन का नाश हो जाना, नाक, कान, लिंग छेदनादि इस लोक में अनेक दंड मिलते हैं, उन्हें भी नहीं गिनता । सब लज्जा छोड देता है, धर्म भ्रष्ट हो जाता है, अपना कुल छोडकर नीच कुल में शामिल होकर खान-पान करता है, अपने पद का, उच्चपना, पण्डितपना, तपस्वीपना, लोकमान्यपना, पूज्यपना सब बिगाड लेता है और नरक जाने का भी भय नहीं करता । इसलिए पर स्त्री में जो आसक्त, उस पुरुष को तीव्र परिणामों से पाप बन्ध होता है । ऐसा पाप बन्ध किसी भी पापी के नहीं होता । कर्मबन्ध तो परिणामों के आधीन है । उसका इस लोक का बिगडना और पर लोक में नरक जाना, दोनों भले ही हों, परन्तु पर की स्त्री का संगम मुझे हो - ऐसा तीव्र परिणाम है, इसके समान कोई अधम परिणाम है ही नहीं । तथा अन्य पुरुष की स्त्री को अन्य पुरुष सेवन करे, तब जातिकु ल की मर्यादा भी गई । माता भी अन्य जाति की रही, पिता भी अन्य जाति का रहा । तब सब कुल भ्रष्ट हो गया, सब धर्म नष्ट हो गया, इसलिए पर स्त्री को अंगीकार करने समान और कोई पाप नहीं है; क्योंकि परस्त्री के सेवन में अदत्तादान नामक तो चोरी का पाप लगता है; मायाचार, झूठ, हिंसा, शीलभंग, अन्याय में प्रवर्तन, तीव्र राग, क्रोधादि कषाय, विषयों की तीव्रता, अति आसक्ति, अति निर्लज्जता और निरन्तर दुर्ध्यान इत्यादि महान अनर्थ से नरक-निगोद का कारण, ऐसा तीव्र कर्मबन्ध करता है ।

  सदासुखदासजी