
एवं परजणदुक्खे णिरवेक्खो दुक्खबीयमज्जेदि ।
णीयं गोदं इच्छीणउं सवेदं च अदितिव्वं॥936॥
पर-दुःख की परवाह नहीं है पर-स्त्रीगामी कामान्ध ।
स्त्री और नपुंसक लिंग का नीच गोत्र का करता बन्ध॥936॥
अन्वयार्थ : जैसे अपनी माता, पुत्री, बहन, स्त्री - इनसे कोई अन्य पुरुष दुराचार करे, तब अपने को दु:ख होता है; वैसे ही अन्य पुरुष की माता, पुत्री, पत्नी, भगिनी से व्यभिचार करने से उस अन्य पुरुष को भी दु:ख होता है । इस प्रकार दूसरों के दु:खी होने का जिसे विचार नहीं, दूसरों के दु:ख में निरपेक्ष जो कामांध, वह दु:ख का कारण अति तीव्र असातावेदनीय नामक कर्म, नीच गोत्र नामक कर्म, स्त्रीवेद तथा नपुसंकवेद नामक कर्म का संचय करता है ।
सदासुखदासजी