
महिलावेसविलंबी जं णीचं कुणइ कम्मयं पुरिसो ।
तह वि ण पूरइ इच्छा तं से परदारगमणफलं॥938॥
जो नर-नारी वेश धारकर यहाँ वहाँ करता दुष्कर्म ।
असन्तुष्ट रहता यह षंढपना परनारी रति का फल॥938॥
अन्वयार्थ : जो कोई पुरुष स्त्री के वेष/भेष का अवलंबन कर नीचकर्म करता है, तो भी काम की इच्छा पूरी नहीं होती है । काम के दाह के कारण जलता है, तृप्ति नहीं होती । यह सब पर स्त्री गमन करने का फल जानना ।
सदासुखदासजी