होइ सयं पि विसीलो पुरिसो अदिदुब्भगो परभवेसु ।
पावइ वधबंधादि कलहं णिच्चं अदोसो वि॥940॥
पर-नारी रत भी पर-भव में अभागा और दुराचारी ।
बिन कारण हो कलह ग्रस्त वध बन्धन आदि कष्ट भोगी॥940॥
अन्वयार्थ : परस्त्री में लंपटी पुरुष कुशील के प्रभाव से अन्य भवों में भी स्वयं कुशीली ही होता है तथा अति दुर्भागी होता है एवं निर्दोष होने पर भी मारण, बंधन, कलह को नित्य ही प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी