
एदे सव्वे दोसा ण होंति पुरिसस्स वंभचारिस्स ।
तव्विवरीया य गुणा हवंति बहुगा विरागिस्स॥942॥
ये सब दोष नहीं होते हैं ब्रह्मचर्य व्रत धारी के ।
इनसे भी विपरीत बहुत गुण होते सदा विरागी के॥942॥
अन्वयार्थ : ब्रह्मचारी पुरुष के पूर्व में कहे ये सभी दोष नहीं होते । काम से विरक्त जो शीलवान पुरुष उसके दोषों से उल्टे बहुत से गुण होते हैं ।
सदासुखदासजी