
कामग्गिणा धगधगंतेण य डज्झंतयं जगं सव्वं ।
पिच्छइ पिच्छयभूदो सीदीभूदो विगदरागो॥943॥
धगधगती कामाग्नि से जलनेवाले इस सब जग को ।
प्रेक्षक होकर लखे विरागी स्वयं कष्ट को नहिं भोगे॥943॥
अन्वयार्थ : धगधगायमान कामाग्नि से जलता हुआ सारे जगत को देखकर चला गया है राग जिसका - ऐसा त्यागी पुरुष शांत रूप सुखी होता हुआ रहता है और साक्षीभूत होकर देखता है । ऐसे ब्रह्मचर्य नामक महा अधिकार में पंचावन गाथाओं में कामकृत दोष कहे ।
सदासुखदासजी